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Study Notes

UPTET EVS: क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौता (Kyoto Protocol and Paris Agreement) की सम्पूर्ण जानकारी

पर्यावरण संरक्षण के लिए वैश्विक समझौते: क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौता (Global Agreements for Environmental Protection: Kyoto Protocol and Paris Agreement)

Practice Questions
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Unictest Team

Updated: 2026-04-20 · English

UPTET EVS: क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौता (Kyoto Protocol and Paris Agreement) की सम्पूर्ण जानकारी

यूपीटीईटी (UPTET) परीक्षा के पर्यावरण अध्ययन (EVS) खंड में पर्यावरण संरक्षण से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय समझौते एक महत्वपूर्ण विषय हैं। इनमें क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौता सबसे प्रमुख हैं। ये दोनों समझौते वैश्विक जलवायु परिवर्तन (Global Climate Change) को संबोधित करने और ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन को कम करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। इस लेख में, हम इन महत्वपूर्ण समझौतों की गहराई से चर्चा करेंगे, जो आपको UPTET 2026 परीक्षा के लिए तैयारी करने में मदद करेगा।


क्योटो प्रोटोकॉल क्या है? (What is the Kyoto Protocol?)

क्योटो प्रोटोकॉल, संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के तहत एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है, जिसका उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करके ग्लोबल वार्मिंग का मुकाबला करना है। इसे जापान के क्योटो शहर में 11 दिसंबर 1997 को अपनाया गया था और यह 16 फरवरी 2005 को लागू हुआ। यह प्रोटोकॉल उन औद्योगिक देशों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन कटौती लक्ष्य निर्धारित करता है जिन्हें 'एनेक्स I' देश कहा जाता है।


मुख्य विशेषताएं और तंत्र (Key Features and Mechanisms):

  • लक्ष्य (Targets): एनेक्स I देशों को 2008-2012 की पहली प्रतिबद्धता अवधि के दौरान 1990 के स्तर से औसतन 5% ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए बाध्य किया गया था। दूसरी प्रतिबद्धता अवधि (2013-2020) दोहा संशोधन के साथ शुरू हुई, जिसमें लक्ष्यों को बढ़ाया गया।
  • सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारियां (Common But Differentiated Responsibilities - CBDR): यह सिद्धांत विकसित देशों पर अधिक जिम्मेदारी डालता है क्योंकि वे ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं। विकासशील देशों (नॉन-एनेक्स I) पर कोई बाध्यकारी लक्ष्य नहीं था।
  • लचीले तंत्र (Flexible Mechanisms): क्योटो प्रोटोकॉल ने उत्सर्जन लक्ष्यों को पूरा करने में देशों की मदद करने के लिए तीन बाजार-आधारित तंत्र पेश किए:
    • स्वच्छ विकास तंत्र (Clean Development Mechanism - CDM): यह विकसित देशों को विकासशील देशों में उत्सर्जन-कम करने वाली परियोजनाओं में निवेश करने और बदले में क्रेडिट (CERs) अर्जित करने की अनुमति देता है।
    • संयुक्त कार्यान्वयन (Joint Implementation - JI): यह एनेक्स I देशों को अन्य एनेक्स I देशों में परियोजनाओं में निवेश करने की अनुमति देता है, जिससे उत्सर्जन क्रेडिट (ERUs) प्राप्त होते हैं।
    • उत्सर्जन व्यापार (Emission Trading - ET): यह देशों को अपने उत्सर्जन भत्ते का व्यापार करने की अनुमति देता है, जिससे वे अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए 'कार्बन क्रेडिट' खरीद या बेच सकें।
UPTET EVS Note: क्योटो प्रोटोकॉल का मुख्य फोकस विकसित देशों द्वारा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने पर था, और इसने वैश्विक जलवायु शासन में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर स्थापित किया। इसके CDM और JI तंत्र UPTET परीक्षा के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

क्योटो प्रोटोकॉल का महत्व (Significance of Kyoto Protocol)

क्योटो प्रोटोकॉल पहला और एकमात्र अंतरराष्ट्रीय समझौता था जिसने कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन कटौती लक्ष्य निर्धारित किए। इसने जलवायु परिवर्तन की वैश्विक समस्या को संबोधित करने के लिए एक ढांचा प्रदान किया और भविष्य के समझौतों, जैसे पेरिस समझौते, के लिए आधार तैयार किया। हालांकि इसकी प्रभावशीलता पर बहस हुई, इसने वैश्विक जलवायु कार्रवाई की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम का प्रतिनिधित्व किया। भारत ने 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल की पुष्टि की थी, लेकिन विकासशील देश होने के कारण उस पर कोई बाध्यकारी उत्सर्जन कटौती लक्ष्य नहीं थे। भारत ने CDM परियोजनाओं के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिससे देश में स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा मिला।

Important Topics Data

विशेषता (Feature)क्योटो प्रोटोकॉल (Kyoto Protocol)पेरिस समझौता (Paris Agreement)
वर्ष (Year)1997 (अपनाया गया), 2005 (लागू)2015 (अपनाया गया), 2016 (लागू)
प्रकृति (Nature)विकसित देशों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्यसार्वभौमिक रूप से कानूनी रूप से बाध्यकारी (NDCs की प्रक्रिया)
दृष्टिकोण (Approach)टॉप-डाउन (Top-Down): UNFCCC द्वारा लक्ष्य निर्धारितबॉटम-अप (Bottom-Up): देश अपने NDCs स्वयं निर्धारित करते हैं
भागीदारी (Participation)मुख्यतः विकसित देश (एनेक्स I)सभी देश (विकसित और विकासशील)
मुख्य लक्ष्य (Main Goal)GHG उत्सर्जन में कमी (विशिष्ट लक्ष्य)वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से नीचे (1.5°C का लक्ष्य)
अवधि (Duration)प्रतिबद्धता अवधि (2008-2012, 2013-2020)दीर्घकालिक, NDCs हर 5 साल में अपडेट होते हैं
प्रमुख तंत्र (Key Mechanisms)CDM, JI, उत्सर्जन व्यापारNDCs, वैश्विक स्टॉकटेक, अनुकूलन, वित्त

Detailed Notes

पेरिस समझौता क्या है? (What is the Paris Agreement?)

पेरिस समझौता एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय संधि है जो जलवायु परिवर्तन पर आधारित है। इसे 12 दिसंबर 2015 को पेरिस, फ्रांस में UNFCCC के पक्षकारों के 21वें सम्मेलन (COP21) में 196 पक्षों द्वारा अपनाया गया था और यह 4 नवंबर 2016 को लागू हुआ। क्योटो प्रोटोकॉल के विपरीत, पेरिस समझौता एक सार्वभौमिक समझौता है जिसमें सभी देशों को अपने उत्सर्जन को कम करने के लिए योगदान देना होता है।


मुख्य विशेषताएं और तंत्र (Key Features and Mechanisms):

  • दीर्घकालिक लक्ष्य (Long-Term Goal): इसका मुख्य लक्ष्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2°C से काफी नीचे रखना है, और 1.5°C तक सीमित करने के प्रयासों को जारी रखना है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions - NDCs): पेरिस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि प्रत्येक देश को अपने स्वयं के जलवायु लक्ष्यों को निर्धारित करने और प्रस्तुत करने की आवश्यकता होती है, जिन्हें NDCs कहा जाता है। ये लक्ष्य हर पांच साल में अपडेट किए जाते हैं और समय के साथ अधिक महत्वाकांक्षी होने की उम्मीद है। यह एक 'बॉटम-अप' दृष्टिकोण है, जो क्योटो प्रोटोकॉल के 'टॉप-डाउन' दृष्टिकोण से भिन्न है।
  • वैश्विक स्टॉकटेक (Global Stocktake): पेरिस समझौता हर पांच साल में वैश्विक स्टॉकटेक नामक एक प्रक्रिया का प्रावधान करता है, जिसमें जलवायु कार्रवाई में सामूहिक प्रगति का मूल्यांकन किया जाता है। पहला स्टॉकटेक 2023 में हुआ।
  • पारदर्शिता और जवाबदेही (Transparency and Accountability): समझौते में एक मजबूत पारदर्शिता ढांचा शामिल है, जिसके तहत देशों को अपनी प्रगति की नियमित रूप से रिपोर्ट करनी होती है।
  • अनुकूलन और वित्त (Adaptation and Finance): इसमें विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूलन में मदद करने और जलवायु वित्त जुटाने के महत्व पर भी जोर दिया गया है।
UPTET EVS Note: पेरिस समझौते का सार्वभौमिक स्वरूप, NDCs का महत्व, और 1.5°C का लक्ष्य UPTET परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु हैं। भारत ने भी अपने महत्वाकांक्षी NDCs प्रस्तुत किए हैं।

UPTET EVS के लिए तैयारी युक्तियाँ (Preparation Tips for UPTET EVS)

UPTET परीक्षा में पर्यावरण अध्ययन खंड में क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। इन विषयों की तैयारी के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान दें:

  • मुख्य उद्देश्य (Main Objectives): दोनों समझौतों के प्राथमिक लक्ष्यों को याद रखें।
  • वर्ष और स्थान (Year and Location): वे कब और कहाँ अपनाए गए/लागू हुए, यह महत्वपूर्ण है।
  • मुख्य तंत्र/अवधारणाएँ (Key Mechanisms/Concepts): CDM, JI, ET, NDCs, Global Stocktake जैसे शब्दों को समझें।
  • अंतर (Differences): दोनों समझौतों के बीच के मूलभूत अंतरों को अच्छी तरह से समझें (जैसे बाध्यकारी प्रकृति, लक्ष्यों का निर्धारण)।
  • भारत की भूमिका (India's Role): भारत ने इन समझौतों में क्या भूमिका निभाई है और उसकी क्या प्रतिबद्धताएँ हैं, इस पर ध्यान दें।

Important Questions & Tips

क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते की तुलना (Comparison of Kyoto Protocol and Paris Agreement)

दोनों समझौते जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन उनके दृष्टिकोण और संरचना में महत्वपूर्ण अंतर हैं। UPTET EVS के लिए इन अंतरों को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है।


प्रमुख तुलनात्मक बिंदु:

  • कानूनी बाध्यकारी प्रकृति: क्योटो प्रोटोकॉल ने केवल विकसित देशों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन कटौती लक्ष्य निर्धारित किए। पेरिस समझौता सार्वभौमिक रूप से कानूनी रूप से बाध्यकारी है, हालांकि NDCs स्वयं बाध्यकारी नहीं हैं, लेकिन उन्हें प्रस्तुत करने और उनकी रिपोर्ट करने की प्रक्रिया बाध्यकारी है।
  • लक्ष्य निर्धारण: क्योटो प्रोटोकॉल में 'टॉप-डाउन' दृष्टिकोण था, जहाँ UNFCCC ने विकसित देशों के लिए लक्ष्य निर्धारित किए। पेरिस समझौते में 'बॉटम-अप' दृष्टिकोण है, जहाँ प्रत्येक देश अपने NDCs (राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान) स्वयं निर्धारित करता है।
  • भागीदारी: क्योटो प्रोटोकॉल मुख्य रूप से विकसित देशों पर केंद्रित था। पेरिस समझौता सभी देशों, विकसित और विकासशील, को शामिल करता है।
  • दीर्घकालिक लक्ष्य: क्योटो प्रोटोकॉल में कोई विशिष्ट दीर्घकालिक तापमान लक्ष्य नहीं था। पेरिस समझौता 2°C और 1.5°C के तापमान लक्ष्य को स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है।
महत्वपूर्ण चेतावनी: UPTET परीक्षा में अक्सर सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं जैसे 'क्योटो प्रोटोकॉल कब लागू हुआ?' या 'पेरिस समझौते का मुख्य लक्ष्य क्या है?' सुनिश्चित करें कि आप इन बुनियादी तथ्यों को याद रखें।

भारत और जलवायु परिवर्तन समझौते (India and Climate Change Agreements)

भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के वैश्विक प्रयासों में सक्रिय रूप से भाग लिया है। भारत ने क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर और पुष्टि की थी, और उसने स्वच्छ विकास तंत्र (CDM) के तहत कई परियोजनाओं को लागू किया। पेरिस समझौते के तहत, भारत ने अपने महत्वाकांक्षी NDCs प्रस्तुत किए हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • 2005 के स्तर से 2030 तक अपनी अर्थव्यवस्था की उत्सर्जन तीव्रता (emission intensity) को 45% तक कम करना।
  • 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन-आधारित ऊर्जा संसाधनों से लगभग 50% संचयी विद्युत शक्ति स्थापित क्षमता प्राप्त करना।
  • 2030 तक अतिरिक्त वन और वृक्ष आवरण के माध्यम से 2.5 से 3 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाना।

ये प्रतिबद्धताएँ दर्शाती हैं कि भारत वैश्विक जलवायु कार्रवाई में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। UPTET EVS परीक्षा के लिए, भारत की इन प्रतिबद्धताओं और इन समझौतों में उसकी भूमिका को समझना आवश्यक है। Unictest पर आपको ऐसे और भी महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत जानकारी और अभ्यास सामग्री मिलेगी, जो आपकी UPTET 2026 की तैयारी को मजबूत करेगी।

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Frequently Asked Questions (UPTET)

क्योटो प्रोटोकॉल का मुख्य उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करके ग्लोबल वार्मिंग का मुकाबला करना था। इसने विकसित देशों (एनेक्स I) के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन कटौती लक्ष्य निर्धारित किए ताकि वे 1990 के स्तर से अपने उत्सर्जन को कम कर सकें। यह UNFCCC के लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।

पेरिस समझौता क्योटो प्रोटोकॉल से कई मायनों में भिन्न है। पेरिस समझौता सार्वभौमिक है, सभी देशों को अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) प्रस्तुत करने की आवश्यकता है, जबकि क्योटो प्रोटोकॉल ने केवल विकसित देशों के लिए बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित किए थे। पेरिस समझौता 'बॉटम-अप' दृष्टिकोण पर आधारित है, जबकि क्योटो प्रोटोकॉल 'टॉप-डाउन' दृष्टिकोण पर था।

UPTET EVS के लिए इन समझौतों की तैयारी के लिए, उनके मुख्य उद्देश्य, अपनाने और लागू होने की तिथियां, प्रमुख विशेषताएं (जैसे CDM, NDCs, वैश्विक स्टॉकटेक), और उनके बीच के अंतरों पर ध्यान दें। भारत की भूमिका और उसकी प्रतिबद्धताओं को भी समझना महत्वपूर्ण है। नोट्स बनाएं, महत्वपूर्ण तथ्यों को याद करें और अभ्यास प्रश्नों को हल करें।

राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) पेरिस समझौते की एक केंद्रीय विशेषता हैं। ये प्रत्येक देश द्वारा स्वेच्छा से प्रस्तुत किए गए जलवायु कार्य योजनाएं हैं, जो यह दर्शाती हैं कि वे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कैसे कम करेंगे और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूल कैसे होंगे। ये योगदान हर पांच साल में अपडेट किए जाते हैं और समय के साथ अधिक महत्वाकांक्षी होने की उम्मीद है।

भारत ने क्योटो प्रोटोकॉल की पुष्टि की और स्वच्छ विकास तंत्र (CDM) के तहत कई परियोजनाओं को सफलतापूर्वक लागू किया। पेरिस समझौते के तहत, भारत ने महत्वाकांक्षी NDCs प्रस्तुत किए हैं, जिनमें उत्सर्जन तीव्रता को कम करना, गैर-जीवाश्म ईंधन ऊर्जा क्षमता बढ़ाना और अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाना शामिल है। भारत वैश्विक जलवायु कार्रवाई में एक सक्रिय और जिम्मेदार भागीदार रहा है।

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