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Mock Tests 2026

Super TET EVS: भारत के प्रमुख पठारों की भूगोल

भारत के प्रमुख पठारों की जानकारी | Prepare for Super TET

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Author

Yadvendra Singh Pal

Founder & Director, Unictest. M.Sc (Maths), MCA & Full-Stack Developer. Former Senior Academic Counsellor with 3+ years of expertise in Teaching Exams (CTET, KVS, DSSSB) and JEE/NEET mentorship. I bridge the gap between complex exam pedagogy and intuitive technology to help students achieve success.

Updated: 2026-08-10 · हिंदी

SUPER TET Mock Test Series — Overview

दोस्तों, आज हम भारत के प्रमुख पठारों के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। ये पठार न केवल भूगोल का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, बल्कि हमारे पर्यावरण और जनजीवन पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। इन पठारों की भौगोलिक विशेषताएँ और महत्व को समझना Super TET परीक्षा के लिए बेहद ज़रूरी है। मैंने देखा है कि इस टॉपिक से 8-10 प्रश्न हर बार आते हैं। इसलिए, इस विषय को अच्छे से समझना आवश्यक है। चलिए शुरू करते हैं!

भारत के पठारों की परिभाषा

पठार एक विस्तृत, अपेक्षाकृत समतल भूमि है जो सामान्यतः चारों ओर से ऊँचे पहाड़ों या पहाड़ियों से घिरी होती है। भारत में कई प्रमुख पठार हैं, जिनमें से कुछ का आकार और ऊँचाई विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। ये पठार आमतौर पर भूगर्भीय क्रियाओं के परिणामस्वरूप बने हैं और इनमें से कई पठारों की उम्र करोड़ों साल पुरानी है।

पठारों का निर्माण मुख्यतः टेक्टोनिक गतिविधियों के कारण होता है। जब भूगर्भीय प्लेटें आपस में टकराती हैं, तो वे पृथ्वी की सतह को उठाते हैं, जिससे पठारों का निर्माण होता है। उदाहरण के लिए, डेक्कन पठार में यह प्रक्रिया हजारों सालों तक चली। यह न केवल भूगोल में, बल्कि जलवायु और पारिस्थितिकी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

भारत के प्रमुख पठारों का इतिहास

भारत के पठारों का इतिहास भूगर्भीय दृष्टिकोण से बहुत दिलचस्प है। डेक्कन पठार, जो की भारत का सबसे बड़ा पठार है, लगभग 65 करोड़ साल पहले बना था। इसे विभिन्न ज्वालामुखीय गतिविधियों के परिणामस्वरूप बनाया गया था, और इसकी मिट्टी कृषि के लिए बहुत उपयुक्त है।

यहाँ पर हम मालवा और रीवा पठार बारे में भी बात कर सकते हैं, जो मध्य प्रदेश में स्थित हैं। इन पठारों का निर्माण भी प्राचीन समय में हुआ, जिससे यह क्षेत्र ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बन गया।

  • 1. डेक्कन पठार
  • 2. मालवा पठार
  • 3. रीवा पठार
  • 4. बंडेल्कंड पठार
  • 5. तिब्बती पठार

भारतीय पठारों का महत्व

पठारों का भारतीय भूगोल में बहुत बड़ा महत्व है। ये न केवल जलवायु को प्रभावित करते हैं, बल्कि कृषि और वन्य जीवों के लिए भी उपयुक्त हैं। डेक्कन पठार की मिट्टी कृषि के लिए बहुत उपयुक्त है और यहाँ पर विभिन्न प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं।

इसके अलावा, ये पठार जल संसाधनों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। कई प्रमुख नदियाँ, जैसे कि गोदावरी और कृष्णा, डेक्कन पठार से निकलती हैं, जिससे जलवायु और पारिस्थितिकी को संतुलित रखने में मदद मिलती है।

एक महत्वपूर्ण बात समझ लीजिए, पठारों की भूगोल का अध्ययन करते समय न केवल उनके आकार, बल्कि उनकी भौगोलिक और पर्यावरणीय विशेषताओं को भी समझना चाहिए।

भारत के प्रमुख पठारों की श्रेणियाँ

पठारों को कई श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है। सबसे पहले, हम उनका भौगोलिक स्थान देख सकते हैं। जैसे कि डेक्कन पठार दक्षिण भारत में है जबकि मालवा पठार मध्य भारत में।

दूसरा, हम पठारों को उनकी ऊँचाई के आधार पर भी वर्गीकृत कर सकते हैं। कुछ पठार जैसे की तिब्बती पठार सबसे ऊँचे माने जाते हैं, जबकि अन्य कम ऊँचाई के होते हैं। इससे हम उनके जलवायु और पारिस्थितिकी को समझ सकते हैं।

  • 1. ऊँचे पठार
  • 2. मध्यम ऊँचाई वाले पठार
  • 3. निचले पठार

पथरीले और मैदानी क्षेत्रों की तुलना

पठारों और मैदानी क्षेत्रों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर होता है। पठार अधिक ऊँचे और पेड़-पौधों और जल के लिए आदर्श होते हैं, जबकि मैदानी क्षेत्र मुख्यतः फसलों की खेती के लिए उपयुक्त होते हैं।

पठारों में जलवायु की विविधता होती है, जिससे यहाँ की जीव-जंतु और वनस्पति में भी भिन्नता दिखती है। उदाहरण के लिए, डेक्कन पठार पर पाया जाने वाला जैव विविधता अद्वितीय है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि कैसे यह भौगोलिक संरचना पर्यावरण को प्रभावित करती है।

दोस्तों, अपने अध्ययन में यह ध्यान रखें कि पठारों की भौगोलिक स्थिति और जलवायु का प्रभाव उनके पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है।

पठारों के पारिस्थितिकी तंत्र

पठारों की पारिस्थितिकी तंत्र भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। यहाँ पर विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु और वनस्पति पाए जाते हैं। जैसे कि डेक्कन पठार पर विभिन्न महत्वपूर्ण वनस्पतियों की प्रजातियाँ, जो यहाँ के पर्यावरण को संतुलित रखने में मदद करती हैं।

इसके अलावा, पठारों पर पाए जाने वाले अधिकांश जीव जंतु समर्पित पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा होते हैं, जिससे हमारी समझ और अध्ययन में वृद्धि होती है। जब मैं अपने छात्रों को ये टॉपिक पढ़ाता हूँ, तो सबसे पहले हम डेक्कन पठार की पारिस्थितिकी देखना शुरू करते हैं।

पठारों का जलवायु पर प्रभाव

पठारों का जलवायु पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। अधिकांश पठारों में बारिश की मात्रा कम होती है, जिससे यहाँ की जलवायु शुष्क होती है। इससे पानी की उपलब्धता कम होती है और कृषि पर भी असर पड़ता है।

जब हम भूगोल सीखते हैं, तो यह देखना ज़रूरी होता है कि किस प्रकार पठारों की जलवायु और मौसम का प्रभाव उनके चारों ओर की भूमि पर होता है। मैंने देखा है कि यह तत्त्व छात्रों के लिए कुछ कठिन होता है, लेकिन यह जानने के बाद वे आसानी से इस पर आगे बढ़ते हैं।

  • 1. डेक्कन पठार का जलवायु
  • 2. तिब्बती पठार का जलवायु
  • 3. उत्तर भारतीय पठार का जलवायु

पठारों का अनुसंधान और संरक्षण

आजकल, पठारों के संरक्षण के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं। यह न केवल जैव विविधता को बचाने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आवश्यक है। कई संगठनों और सरकारों द्वारा इनमें संरक्षण प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं।

आपको यह जानकर ख़ुशी होगी कि भारतीय सरकार द्वारा कई महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाई गई हैं जो पठारों के संरक्षण और उनके पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए काम कर रही हैं। मेरा सुझाव है कि छात्र इन योजनाओं के बारे में जानें, ताकि वे अपने ज्ञान को बढ़ा सकें।

पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें

पठारों के अध्ययन के लिए कई पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध हैं। जैसे कि NCERT की किताबें, जो विशेष रूप से विद्यार्थियों के लिए उपयोगी होती हैं। मैंने व्यक्तिगत रूप से देखा है कि जो छात्र इन पुस्तकों को पढ़ते हैं, उन्हें भूगोल का विषय और भी आसान लगता है।

इसके अलावा, कई प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए विशेष कोचिंग सेंटर भी हैं जो पाठ्यक्रम को कवर करने में मदद करते हैं। आप इन कोचिंग सेंटर में जाकर अपने ज्ञान को बढ़ा सकते हैं।

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Available Mock Tests

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SUPER TET Previous Year Paper

120 Min | 100 Qs

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Test Series Features

पूरी तैयारी रणनीति का अवलोकन

Super TET परीक्षा की तैयारी के लिए एक ठोस रणनीति बनाना बहुत ज़रूरी है। तैयारी के पहले चरण में आपको अपने पाठ्यक्रम को अच्छे से समझना होगा। जैसे ही आप पाठ्यक्रम को समझ लेते हैं, आपको एक विस्तृत अध्ययन योजना बनानी चाहिए, जिसमें सभी मुख्य विषय और उनके उपविषय शामिल हों।

अधिकतर छात्रों को समय प्रबंधन में कठिनाई होती है। इसलिए, मेरा सुझाव है कि आप अपनी दिनचर्या में एक निश्चित समय का मूल्यांकन करें, जहाँ आप हर विषय को समर्पित समय दे सकें। यह आपकी तैयारी को सरल और प्रभावी बनाएगा।

एक्स्पर्ट टिप: समय प्रबंधन की रणनीतियों को अपनाने से आपकी तैयारी में एक बड़ा बदलाव आ सकता है।

महीने-दर-महीने अध्ययन योजना

अगले 6 महीनों के लिए एक योजना बनाना फायदेमंद रहेगा। पहले महीने में, आप मुख्य अवधारणाओं और विषयों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। इसके बाद, धीरे-धीरे पिछले वर्ष के प्रश्न पत्रों का अभ्यास करें और उन्हें हल करें।

दूसरे और तीसरे महीने में, आपके द्वारा सीखी गई सामग्री पर ध्यान दें और उसे रिवाइज करें। प्रत्येक दिन एक निश्चित समय पर रिवीज़ करने से आपको विषयों को याद रखने में मदद मिलेगी।

विषयवार विभाजन के साथ अंक वितरण

अंक वितरण पर ध्यान देना भी महत्वपूर्ण है। प्रत्येक विषय के लिए संभावित अंक और उनके महत्व को समझें। जैसे कि भूगोल और पर्यावरण अध्ययन में अधिक अंक होते हैं, जबकि गणित और सामान्य अध्ययन में भी महत्वपूर्ण होते हैं।

अगर हम पिछले वर्षों के आंकड़ों को देखें, तो हम देख सकते हैं कि भूगोल के टोपिक्स से हमेशा 15-20 अंक आते हैं। आपको यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आप इन विषयों पर विशेष ध्यान दें।

  • 1. भूगोल (20 अंक)
  • 2. पर्यावरण अध्ययन (15 अंक)
  • 3. गणित (10 अंक)

महत्वपूर्ण विषयों की सूची

कुछ महत्वपूर्ण विषय हैं जो आपको Super TET परीक्षा में कवर करना चाहिए। इनमें प्रमुख विषय जैसे भूगोल, विज्ञान, गणित, और पर्यावरण अध्ययन शामिल हैं। आपको इन विषयों की विस्तृत अध्ययन करना चाहिए।

इसके लिए एक लिस्ट बनाकर उसे अपने पास रखें ताकि आप इन्हें पढ़ने के दौरान देख सकें। मैंने पिछले 5 साल में देखा है कि ये विषय विशेष रूप से महत्वपूर्ण होते हैं।

  • 1. भूगोल
  • 2. पर्यावरण अध्ययन
  • 3. गणित
  • 4. हिंदी
  • 5. सामान्य ज्ञान

सर्वश्रेष्ठ किताबें

Super TET परीक्षा की तैयारी के लिए कई बेहतरीन किताबें उपलब्ध हैं। जैसे कि NCERT की किताबें, जो खासकर स्कूल स्तर के लिए उपयोगी होती हैं। इसके अलावा, मुझे 'Kiran's Super TET Guide' भी पसंद है, जो सभी महत्वपूर्ण टॉपिक्स को कवर करती है।

पुस्तकों का चयन करते समय ध्यान रखें कि वे आपके पाठ्यक्रम और पिछले प्रश्न पत्रों के अनुसार होनी चाहिए। इससे आपको परीक्षा में सहायता मिलेगी।

कोचिंग बनाम आत्म-अध्ययन

कोचिंग और आत्म-अध्ययन के बीच का चयन आपके व्यक्तिगत अध्ययन के तरीके पर निर्भर करता है। बहुत से छात्र कोचिंग को पसंद करते हैं क्योंकि वहाँ उन्हें एक दिशा मिलती है। लेकिन आत्म-अध्ययन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

मेरे अनुभव में, कई टॉपर्स ने आत्म-अध्ययन के साथ-साथ कोचिंग की मदद ली है। एक लिस्ट बनाकर अपनी पसंद का अध्ययन करें।

  • 1. कोचिंग का फायदा
  • 2. आत्म-अध्ययन की ताकत
एक्स्पर्ट टिप: कोचिंग और आत्म-अध्ययन का मिश्रण आपके अध्ययन को और प्रभावी बनाएगा।

समय प्रबंधन और दैनिक कार्यक्रम

समय प्रबंधन एक महत्वपूर्ण कौशल है, जिसे आपको अपनी तैयारी के दौरान सीखना चाहिए। एक कैलेंडर बनाएं और उसमें हर विषय के लिए समय निर्धारित करें। इससे आपको अध्ययन में संगठन मिलेगा।

दैनिक कार्यक्रम में सुबह जल्दी उठना और निश्चित समय पर अध्ययन करना उपयोगी होता है। मैं हमेशा अपने छात्रों को सलाह देता हूँ कि वे अपने अध्ययन का एक ठोस कार्यक्रम रखें। यह आपको फोकस्ड और डेडिकेटेड बनाएगा।

अंतिम 30 दिनों की पुनरावृत्ति रणनीति

परीक्षा से 30 दिन पहले यह सबसे महत्वपूर्ण अवधि होती है। इस दौरान, आपको अपनी तैयारी को मजबूत करना है। पिछले प्रश्न पत्रों को हल करना और रोजाना रिवाइज करना आवश्यक है।

मेरे कई छात्रों ने आखिरी महीने में दैनिक रिविजन करके अपने नंबर बढ़ाए हैं। इसलिए इस अवधि का सही उपयोग आवश्यक है।

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Frequently Asked Questions (SUPER TET)

Super TET परीक्षा में भारतीय पठारों से हर साल 8 से 10 प्रश्न आते हैं, जो इस विषय के महत्व को दर्शाता है। इसलिए, इसे अच्छे से समझना व तैयारी करना बहुत आवश्यक है। पिछले 5 सालों में इस टॉपिक से प्रश्नों की संख्या स्थिर रही है।

Super TET परीक्षा के लिए उम्र की सीमा 18 से 40 वर्ष है, हालांकि, आरक्षित वर्ग के छात्रों के लिए उम्र में छूट है। इस विषय में अधिक जानकारी के लिए आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर चेक करें।

Super TET की तैयारी के लिए NCERT की किताबें और Kiran's Super TET Guide बहुत उपयोगी साबित होती हैं। इसके अलावा, आपको सभी महत्वपूर्ण विषयों पर ध्यान देना चाहिए, जैसे भूगोल, गणित, और पर्यावरण अध्ययन।

Super TET परीक्षा में 150 प्रश्न होते हैं, जिनमें से प्रत्येक प्रश्न 1 अंक का होता है। गलत उत्तर के लिए 0.25 अंक की नकारात्मक मार्किंग होती है। इसलिए, प्रश्नों को हल करते समय ध्यान रखें।

सफलता के लिए एक ठोस अध्ययन योजना बनाना महत्वपूर्ण है। साथ ही, पिछले वर्ष के प्रश्न पत्रों का अभ्यास करना, समय प्रबंधन की कला सीखना, और नियमित रूप से रिविजन करना अच्छा रहेगा।

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